महावीर जैन की जीवनी तथा उनके द्वारा दी गई शिक्षाएं




जन्म - वैशाली (कुंण्डाग्राम) बिहार 599 ई. पूर्व

पिता - सिद्धार्थ

माता - त्रिशला

पत्नी - यशोदा

संतान-पुत्री - प्रियदर्शनी

भाई - नंदिवर्धन

बहन - सुदर्शना

गौत्र - कश्यप

ज्ञान प्राप्ति - (बिहार) ऋजुपालिका नदी के किनारे

मौहक्ष प्राप्ति - पावापुरी (बिहार) 527 ई. पूर्व

महावीर जैन का जीवन परिचय: - 

महावीर जैन का जन्म 599 ई. पूर्व वैशाली के निकट कुण्डाग्राम (वर्तमान बिहार) चैत्र माह में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ उनके बचपन का नाम वर्द्धमान था उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था जो ज्ञातृक कुल के गणराजा थे इनकी माता का नाम त्रिशला था जो लिच्छवी गणराज्य के राजा चेटक की पुत्री थी। । महावीर के बड़े भाई का नाम नंदिवर्धन था। नंदिवर्धन के जन्म के प्रश्चात एक दिन रात्रि के दूसरे पहर स्वपन देख महारानी त्रिशला चकित हो उठी। उन्होने सपने में सफेद हाथी, सफेद बैल, एक सिंह, लक्ष्मी माता, फूलों की हार, चॉंद, सूरज, एक ध्वज, एक चॉंदी का कलश, कमल के फूलों से भरे तालाब, दूध का सागर, एक दिव्य रथ, पत्थरो का संग्रह और धुर्ममुक्त अग्नि देखा।
अगले दिन सुबह राजज्योतिषी को बुलाया गया। राजज्योतिषी ने कहा कि महाराज सिद्धार्थ आपकी पत्नी एक महान बालक को जन्म देगी। महाराज सिद्धार्थ ने राजज्योतिषी से सभी सपनों का अर्थ समझाने को कहा। राजज्योतिषी ने कहा कि सफेद हाथी ये दर्शाता है कि आपका पुत्र कष्ट और लालच जैसी सभी बुरी आदतों से समस्त मानवजाति की रक्षा करेगा। सफेद बैल ये दर्शाता है कि आपका पुत्र एक महान गुरू होगा। सिंह ये दर्शाता है कि आपका पुत्र बलवान और प्रभावशाली होगा। लक्ष्मीमाता यह दर्शाता है कि आपका पुत्र धनवान व‌ सफल होगा। फूलों की माला ये दर्शाती है कि फूलों की सुगंध की तरह ही आपके पुत्र के द्वारा दी गई शिक्षाएं चारों और फेले‌गी। चॉंद ये दर्शाता है कि आपका पुत्र प्रकृति के अनुसार स्वस्थ होगा। सुरज ये दर्शाता है कि आपका पुत्र लोगों को अपने अंतरिम दानव का नाश करने में सहायता करेगा। ध्वज‌ ये दर्शाता है कि आपका पुत्र एक प्रभावशाली मार्गदर्शक होगा। चॉंदी का कलश ये दर्शाता है कि आपके पुत्र का हृदय पवित्र होगा। कमल के फूलों से भरा तालाब ये दर्शाता है कि आपका पुत्र जन्म और मृत्यु के घटनाचक्र में फॅं‌से लोगों को मौक्ष प्राप्ति‌ की‌‌ और ले जाएगा। दूध का सागर ये दर्शाता है कि आपका पुत्र समस्त सृष्टि को मौ‌क्ष का मार्ग‌ दिखलाएगा। दिव्य रथ ये दर्शाता है कि स्वयं ईश्वर भी आपके पुत्र द्वारा दी गई शिक्षा का आदर करेंगे। पत्थरों का संग्रह यह दर्शाता है कि आपका पुत्र असीम बुद्धि‌ का स्वामी होगा‌ और धूर्म‌मुक्त अग्नि ये दर्शाता है कि आपका पुत्र बिना किसी स्वार्थ के लोगों के जीवन को प्रकाशित करेगा।


दिगम्बर परंपरा के अनुसार महावीर स्वामी एक बाल ब्रह्मचारी थे बचपन से ही ब्रह्मचर्य में उनकी रूचि थी। महावीर संस्कृत के प्रख्यात विद्वान थे वे विवाह नहीं करना चाहते थे।
श्वेताम्बर परंपरा के अनुसार महावीर स्वामी का विवाह इनकी इच्छा के विरुद्ध राजकुमारी यशोदा से करा दिया गया। यशोदा ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम प्रियंदर्शनी था। लेकिन ये सभी चीजें महावीर को घर संसार से बांधकर नहीं रख सकी महावीर स्वामी ने 29 वर्ष की आयु में अपने प्रिय मित्र की आज्ञा लेकर गृहत्याग कर निरवस्त्र होकर ब्रह्मचर्य का पालन करने लगे। महावीर स्वामी ने मार्गशीर्ष दशमी को कुण्लपुर मे
दीक्षा प्राप्त किया और दीक्षा प्राप्ति के प्रश्चात दो दिन बाद खीर से इन्होनें प्रथम पारणा किया दीक्षा प्राप्ति के बाद कुण्डलपुर के निकट सदावन में इन्होनें तपस्या आरंभ किया। 12 वर्षो तक ये सच्चे ज्ञान की खोज में भटकते रहे इस दौरान लोगों ने इनकी खूब हॅंसी उ‌ड़ायी। लेकिन वे अपनी साधना में लीन रहे और 12 वर्ष 6 महीने की कठोर तपस्या के बाद 42 वर्ष की आयु में ऋजुपालिका नदी के किनारे साल वृक्ष के नीचे उन्हेे‌ केवल्य यानि ज्ञान की प्राप्ति हुई।

जैन विद्वान जनपदराय जैन के अनुसार महावीर स्वामी के प्रथम अनुयायी जमाली बने जो महावीर स्वामी की पुत्री प्रियदर्शिनी के पति थे। इसके बाद 30 वर्षों तक वे जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में लगे रहे और इस दौरान महावीर स्वामी ने चारों ओर अहिंसा, सत्य और त्याग का संदेश फैलाया महावीर ने अपने इंद्रियों पर विजय प्राप्त की जिसके कारण वे जीतेंद्र कहलाए। महावीर स्वामी ने जैन धर्म में चतुर्विद संघ की स्थापना की। जैन ग्रंथों के अनुसार महावीर जैनियों के 24 वें और अंतिम तीर्थंकर थे। जैन परंपराओं के अनुसार 18 हजार योगी, 36 हजार मठवा‌सी, 1 लाख 59 हजार स्रावक और 3 लाख स्राविका महावीर स्वामी के अनुयायी बने। अंत में 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावापुरी मे कार्तीक कृष्णपक्ष में दिवाली की पूर्व संध्या को उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।

महावीर जैन द्वारा दिए गए उपदेश :- महावीर स्वामी द्वारा दिए गए उपदेशों को जैन ग्रंथो में पंच अणुव्रत कहा गया है। ये पंच अणुव्रत है:-

(1) सत्याचरण‌ - इसके बारे में भगवान महावीर कहते हैं कि है मनुष्य तु सत्य को ही कि सच्चा समझ। जो बुद्धिमान मनुष्य सत्य की सरण में रहता है वह मौक्ष को आसानी से प्राप्त कर लेता है।

(2) अहिंसा :- महावीर कहते हैं 'अहिंसा परमो धर्म यत‌तो धर्म स्ततो जय' वे कहते अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है इसका अर्थ है किसी जीव को कष्ट नहीं पहुंचाना‌। महावीर कहते हैं कि धर्म का सबसे उत्तम माध्यम है अहिंसा और संयम। महावीर स्वामी कहते हैं कि सृष्टि के कण-कण में चाहे वो संजीव हो या निर्जीव सभी में आत्मा का वास है। वे कहते हैं जिसके मन में सदा धर्म होता है उसे दे‌वता भी नमन करते हैं।

(3) अपरिग्रह :- अपरिग्रह का तात्पर्य है किसी वस्तु के प्रति आसक्ति का ना होना। महावीर कहते हैं कि जीवन में अपरिग्रह का होना बहुत जरूरी है क्योंकि मनुष्य की इच्छा‌यें असीम व‌ अनंत है उन पर नियंत्रण रखने के  लिए और शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए अपरिग्रह का होना अतिआवश्यक है। महावीर कहते हैं संसार के सभी बंधनों से मुक्ति के लिए मनुष्य को अपने सभी इंद्रियों को वश में करना परमावश्यक है।

(4)अस्तेय :- अस्तेय का तात्पर्य है किसी दूसरे व्यक्ति की वस्तु को 'चोरी नहीं करना' महावीर कहते हैं किसी दूसरे व्यक्ति की वस्तु को उसकी आज्ञा के विरुद्ध या बिना उसकी आज्ञा के लेना एक प्रकार की हिंसा है।

(5) ब्रह्मचर्य :- महावीर जैन कहते हैं कि ब्रह्मचर्य सबसे श्रेष्ठ तपस्या है ब्रह्मचर्य का अर्थ है सभी प्रकार की विषय वासना‌ओ का परित्याग इसके पालन से ही मौक्ष की प्राप्ति संभव है।



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