स्वामी विवेकानंद की जीवनी

स्वामी विवेकानंद की जीवनी।

 (Biography of swami

 Vivekananda in Hindi)

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स्वामी विवेकानंद की जीवनी
     Image source:www.punjabkesari.in


स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय :-

स्वामी विवेकानंद का जन्म कब और कहॉं हुआ :- 

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1869 को कोलकाता में एक कुलीन उदार परिवार में हुआ स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेंद्रनाथ दत्त था उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था जो कोलकाता हाई कोर्ट में प्रसिद्ध वकील थे उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थी। स्वामी विवेकानंद के कुल 9 भाई-बहन थे। स्वामी विवेकानंद के दादा दुर्गा दत्त फारसी और संस्कृत के विख्यात विद्वान थे जिन्होंने 25 वर्ष की उम्र में ही परिवार और घर त्याग कर संयास ले लिया था।

स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा कहॉं से प्राप्त किया :-

स्वामी विवेकानंद बचपन से ही बड़े तीव्र थे उन्होंने 8 वर्ष की आयु में सन् 1871 में 'ईश्वर चंद्र विद्यासागर मेट्रोपोलिटन संस्थान' में दाखिला लिया इसके प्रश्चात उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। 1879 में, स्वामी विवेकानंद कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज के इंट्रेंस परीक्षा पास किया इसके साथ ही वे कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से इंट्रेंस परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले पहले विद्यार्थी बने उन्होंने पश्चिमी तट जीवन और यूरोपीय इतिहास की पढ़ाई जनरल इंस्टिट्यूट असेंबली से की 1881 में उन्होंने ललित कला की परीक्षा पास की और 1884 में उन्होंने स्नातक की डिग्री पूरी की नरेंद्रनाथ दत्त ने डेविड ह्यूम इमैनुएल कैंट और चार्ल्स डार्विन जैसे महान वैज्ञानिकों का अध्ययन कर रखा था स्वामी विवेकानंद हरबर्ट स्पेंसर के विकास सिद्धांत से प्रभावित थे जिसके कारण उन्होंने हरबर्ट स्पेंसर की किताब को बंगाली में परिभाषित किया।

 स्वामी विवेकानंद की अध्यात्मिक शिक्षा :- उन्होंने आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहले ब्रह्म समाज में प्रवेश किया किंतु वहां उनके चित्र को संतोष नहीं हुआ वे वेदांत योग को पश्चिम संस्कृत में प्रचलित करने के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान देना चाहते थे रामकृष्ण परमहंस की तारीफ सुनकर स्वामी विवेकानंद उनसे तर्क करने के उद्देश्य से उनके पास गए किंतु रामकृष्ण परमहंस के विचारों से प्रभावित होकर स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु मान लिया परमहंस की कृपा से उन्हें आत्म साक्षात्कार हुआ स्वामी विवेकानंद परमहंस के सबसे प्रिय शिष्य थे।25 वर्ष की आयु में ही स्वामी विवेकानंद ने गेरुआ वस्त्र धारण कर संयास ले लिया और विश्व भ्रमण पर निकल पड़े।

स्वामी विवेकानंद के द्वारा शिकागो में दिया गया प्रसिद्ध भाषण :- 

1993 में अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व धर्म परिषद का आयोजन किया गया जहां उन्होंने इतिहास का सबसे चर्चित भाषण दिया इस धर्म परिषद में स्वामी विवेकानंद भारत के प्रतिनिधि बनकर गए लेकिन उस समय यूरोप में भारतीयों को हीन दृष्टि से देखा जाता था लेकिन कहते हैं ना कि उगते सूरज को कौन रोक सकता है शिकागो में लोगों के विरोध के बावजूद एक प्रोफेसर के प्रयास से स्वामी जी को बोलने का अवसर प्राप्त हुआ स्वामी जी ने अंग्रेजी में "My all American Brother and Sister" कहकर उस सभा को संबोधित किया जिसके बाद उस भाषण सभा में उपस्थित विश्व के 6000 से भी अधिक विद्वानो ने करीब 2 मिनट तक लगातार तालियां बजायी। उन्होंने लगातार 20 मिनट तक भाषण दिया उन्होंने कहा कि जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु को उसकी आत्मा से पृथक रखकर प्रेम करते हैं तो फलत हमें कष्ट भोगना पड़ता है अतः हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम व्यक्ति को आत्मा से जोड़ कर देखें या उसे आत्म स्वरूप मानकर चलें तो हम हर स्थिति में कष्ट रोग और तटस्थ से निर्विकार रहेंगे अगले दिन सभी अखबारों में यह घोषणा कोई की विवेकानंद का भाषण इतिहास का सबसे सफल भाषण था जिसके बाद इस भाषण को इतिहास का सबसे चर्चित भाषण माना जाने लगा इसके बाद संपूर्ण विश्व स्वामी विवेकानंद और भारतीय संस्कृति को जानने लगा। इसके बाद 2 वर्ष तक स्वामी विवेकानंद अमेरिका के विभिन्न शहरों में भारतीय अध्यात्म का प्रचार प्रसार करते रहे इसके बाद वे इंग्लैंड गए वहां की मार्गरेट नोबद उनके अनुयायी बने जो बाद में 'सिस्टर निवेदिता' के नाम से प्रसिद्ध हुई वर्ष 1897 को वे स्वदेश लौट कर आए स्वामी विवेकानंद ने 1897 में 'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना की और धार्मिक आडंबरो, रूढ़ियों और पुरोहितवाद से लोगों को बचने की सलाह दी। स्वमी विवेकानंद ने अपने विचारों की क्रांति से लोगों और समाज को जागृत करने का कार्य किया।

स्वामी विवेकानंद के बारे में 'रविंद्र नाथ टैगोर' कहते हैं कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए उनमें आप सब कुछ सकारात्मक पाएंगे नकारात्मक कुछ भी नहीं।

स्वामी विवेकानंद के राजनीतिक विचार :- 

स्वामी विवेकानंद एक राजनीतिक विचारक नहीं थे लेकिन उन्होंने अपने भाषणो और रचनाओं के माध्यम से जो विचार व्यक्त किए उसके आधार पर कहा जा सकता है कि वे भारतीय राष्ट्रवाद के एक धार्मिक नियमों का निर्माण करना चाहते थे। 
राष्ट्रवाद के प्रमुख सिद्धांत :- स्वामी विवेकानंद कहते थे कि जिस प्रकार संगीत के एक प्रमुख स्वर होते हैं उसी प्रकार प्रत्येक राष्ट्र के जीवन में एक प्रधान तत्व हुआ करता है इसलिए उन्होंने राष्ट्रवाद के एक धार्मिक सिद्धांत की नींव का निर्माण करने के लिए कार्य किया।

स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायक विचार :- 

वे एक महान अभिव्यक्ति थे उनके विचारों मे एक अलग ही जोश था। उनके विचारों से सभी के मन में एक अलग ही प्रकार का जोश भर जाता है वे कहते हैं कि उठो, जागो और तब तक मत रूको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए स्वामी विवेकानंद सभी युवाओं के लिए आज भी एक प्रेरणा का स्रोत है

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कब हुई :- ‍‍‍‌‌

स्वामी विवेकानंद जी की मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुई उनकी मृत्यु के समय उनकी आयु 39 वर्ष 5 महीने तथा 24 दिन थी।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु के क्या कारण थे :- 

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार स्वामी विवेकानंद कई रोगों से ग्रसित थे और हृदय गति रुक जाने के कारण उनकी मृत्यु हुई लेकिन स्वामी विवेकानंद के शिष्यों का कहना था कि स्वामी विवेकानंद ने स्वेच्छा से अपनी समाधि ले लिया स्वामी जी के शिशु के अनुसार उन्हे इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। कहां जाता है कि स्वामी विवेकानंद ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही अपनी मृत्यु के समय को निर्धारित कर दिया था उन्होंने कहा था कि 40 वर्ष की आयु से पूर्व ही मेरी आत्मा इस नश्वर शरीर को छोड़ देगी।

पूरे विश्वभर में आज भी स्वामी विवेकानंद का नाम ‌बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है वे आज भी सभी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। स्वामी विवेकानंद की जीवनी को चिन्हित करने के लिए भारत में प्रत्येक वर्ष 12 जनवरी को युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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