हल्दीघाटी युद्ध का इतिहास । Battle of haldighati in Hindi

हल्दीघाटी के युद्ध का इतिहास

1. हल्दीघाटी का युद्ध कब और किनके बीच हुआ ?

‘ हल्दीघाटी का युद्ध ‘ इतिहास के सबसे चर्चित युद्ध में से एक माना जाता है और यह युद्ध इतिहास में प्रसिद्ध है यह युद्ध मेवाड़ के प्रतापी राजा महाराणा प्रताप एवं मुगल सम्राट अकबर के बीच 18 जून 1576 को गोगुंडा के निकट अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी मैदान में हुआ वर्तमान में यह स्थान राजस्थान के एकलिंगजी नामक स्थान से 18 किलोमीटर दूरी पर स्थित है यह युद्ध सिर्फ 4 घंटे तक चला था ।

मुगलकालीन इतिहासकार अबुल फजल ने इस युद्ध को ‘ खमनौर का युद्ध ‘ कहा है क्योंकि इस युद्ध में सबसे ज्यादा रक्तपात खमनौर में हुआ था ।

हल्दीघाटी केपाता युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना में मुख्य सेनापति ग्वालियर के राम सिंह तोमर , कृष्णदास , चुंडावत रामदास , राठौड़ सिंह झाला , पुरोहित गोपीनाथ , शंकर दास , चरण जेस और पुरोहित जगन्नाथ जैसे योद्धा शामिल थे|

2. महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की सेन्य शक्ति 

महाराणा प्रताप की सेना की अगुवाई आफगान नेता  हाकिम खान सूर ने की थी जिसके परिवार से अकबर का पुराना बेर था महाराणा प्रताप की सेना की तरफ से आदिवासी सेना के रूप में 400 से 500 भील भी शामिल थे जिसका नेतृत्व भील राजा राजाराव पूंजा ने किया था भील शुरुआत से ही राजपूतों के स्वामी भक्त रहे थे इसलिए उन्होंने अकबर के बजाय महाराणा प्रताप का साथ दिया।

राजस्थान का इतिहास लिखने वाले जेम्स टॉड के अनुसार हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना में 22000 सैनिक जबकि अकबर की सेना में 80,000 सैनिक शामिल थे हल्दीघाटी के इस युद्ध अकबर की सेना का नेतृत्व आमेर के राजपूत राजा ‘ मानसिंह ‘ ने किया था।

अकबर की सेना में सेनापति मानसिंह के अलावा सैय्यद हासिम , सैय्यद अहमद खां , बहलोल खान , सुल्तान खान , गाजी खान , भोकाल सिंह , खेरासन और वसीम खान जैसे योद्धा थे।

3. हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम

हल्दीघाटी के रक्ततलाई क्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ पहाड़ी इलाकों में युद्ध होने के कारण महाराणा प्रताप को इसका काफी फायदा हुआ इतिहास में इस युद्ध को अनिर्णायक युद्ध माना गया है कहा जाता है कि इस युद्ध में ना तो अकबर की जीत हुई और ना ही महाराणा प्रताप की हार हुई किंतु फिर भी इतिहासकार यह मानते हैं कि है कि इस युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना ने अकबर की विशाल सेना के छक्के छुड़ा दिए थे ।

महाराणा प्रताप की सेना में हकीम खान सूर , डोडिया भीम , मान सिंह झाला , मानसिंह तंवर और उनके पुत्र सहित अनेकों राजपूत योद्धा शहीद हुए जबकि इस युद्ध में अकबर की सेना में मानसिंह के अलावा सभी बड़े योद्धा मारें गये।

लड़ाई के दौरान अकबर ने कुम्भलमेर दुर्ग से महाराणा प्रताप को खदेड़ दिया तथा मेवाड़ पर अनेक आक्रमण करवाये , लेकिन फिर भी महाराणा प्रताप ने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। यह युद्ध महाराणा प्रताप के पक्ष में निर्णायक नहीं हो सका । खुला युद्ध समाप्त हो गया था , किंतु संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था भविष्य में इन संघर्षों को अंजाम देने के लिए महाराणा प्रताप एवं उनकी सेना युद्ध स्थल से हट कर पहाड़ी प्रदेश में आ गयी । 

कहा जाता है कि इस युद्ध में जब महाराणा प्रताप मानसिंह के करीब पहुंचे तो उन्होंने अपने घोड़े चेतक को मानसिंह के हाथी पर चढ़ा दिया और उन्होंने अपने भाले से मानसिंह पर बार किया लेकिन फिर भी मानसिंह किसी तरह से बच निकला लेकिन मान सिंह का हाथी मारा गया चेतक जब हाथी से उतरा तो हाथी की सूंड में लगी तलवार से महाराणा प्रताप के घोड़े ‘ चेतक ‘ का एक पेर बुरी तरह से घायल हो गया इसके बाद भी चेतक ने हार नहीं मानी उसने महाराणा प्रताप को युद्ध भूमि से बाहर निकाला और उन्हें युद्धभूमि से 5 किमी० दूर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया रास्ते में दौड़ते – दौड़ते चेतक ने एक बड़े नाले से छलांग लगाई जिसके कारण महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के प्राण चले गए

चेतक की मृत्यु पर महाराणा प्रताप को काफी शौक हुआ क्योंकि ‘ चेतक ‘ महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा था। इसके पश्चात महाराणा प्रताप के भाई ‘ शक्ति सिंह ‘ को अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने महाराणा प्रताप की मदद की।

महाराणा प्रताप के युद्ध भूमि छोड़कर चले जाने पर उनके स्थान पर उनके हमसकल ‘ झाला मानसिंह ‘ ने महाराणा प्रताप का मुकुट पहनकर मुगलों को भ्रमित किया मुगल उनको प्रताप समझ कर उन पर टूट पड़े उन्हें महाराणा प्रताप समझकर मुगलों ने मार डाला ।

हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने अपना राजसी जीवन त्याग दिया और जंगलों में जीवन बिताने का निश्चय किया महाराणा प्रताप ने भील समुदाय की सहायता से चित्तौड़ को छोड़कर पुनः संपूर्ण मेवाड़ पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।

 

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