द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण और परिणाम । World War 2 Reason and Result

द्वितीय विश्वयुद्ध का इतिहास कारण और परिणाम । World War 2 History, Reason and Result in Hindi

द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत :- 

कहा जाता है कि 1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया इसके साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हो गई थी इसके बाद इंग्लैंड और फ्रांस ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा की हालांकि, एक सितंबर 1939 से 9 अप्रैल 1940 तक के युद्ध को नकली युद्ध कहा जाता है क्योंकि इस अवधि में युद्ध की स्थिति बनी थी लेकिन इस अवधि के दौरान कोई भी युद्ध नहीं हुआ था। 9 अप्रैल 1940 को जर्मनी ने नार्वे और डेनमार्क पर हमला कर उन पर कब्जा कर लिया। 
जून 1940 के अंत तक बेल्जियम और हॉलैंड के और फ्रांस ने भी जर्मनी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बाद जर्मनी इंग्लैंड पर कब्जा करना चाहता था लेकिन जर्मनी इंग्लैंड पर कब्जा नहीं कर सका हालांकि, जून 1941 में जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला कर‌ सोवियत संघ के एक बड़े क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया लेकिन सोवियत संघ ने मॉस्को की सहायता से जर्मन सेना पर हमला किया और उसे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रमुख कारण ( Reason of Second World War ) :-

इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध कहे जाने वाले द्वितीय विश्वयुद्ध के कई कारण थे जिसके कारण यह युद्ध हुआ जिनमें से कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित है –

राष्ट्र संघ की विफलता – 

विश्व शांति को बनाए रखने के लिये सन् 1919 में राष्ट्र संघ की स्थापना की गई, राष्ट्र संघ एक प्रमुख वैश्विक संगठन था जिसकी स्थापना का उद्देश्य विश्व के विश्व के सभी देशों के बीच होने वाले आपसी विवाद को युद्ध के बजाए बातचीत के द्वारा सुलझाना था लेकिन यह संगठन सफल नहीं हो पाया राष्ट्रसंघ कभी भी सार्वभौमिक संगठन नहीं बन पाया । अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन राष्ट्रसंघ के संस्थापक तथा निरस्त्रीकरण एवं सामूहिक सुरक्षा की अवधारणाओं के प्रधान प्रवर्तक थे दुर्भाग्यवश स्वयं उन्हीं का देश कभी भी राष्ट्रसंघ का सदस्य नहीं बना इसके अलावा जर्मनी और साम्यवादी रूस को राष्ट्रसंघ की सदस्यता के लिए आमंत्रित ही नहीं किया गया था लेकिन संधि के पश्चात् जर्मनी 1926 में राष्ट्रसंघ का सदस्य बना परंतु हिटलर के सत्ता में आने के कुछ ही महीने पश्चात सन् 1933 में जर्मनो ने राष्ट्रसंघ की सदस्यता का त्याग कर दिया । 

सोवियत संघ ने सन् 1934 में राष्ट्रसंघ की सदस्यता प्राप्त की , परंतु फिनलैंड पर उसके द्वारा किए गए आक्रमण के कारण सन् 1940 में सोवियत संघ को राष्ट्र संंघ की सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया जो भी देश राष्ट्रसंघ के किसी भी निर्णय से निराश हुआ उसी ने राष्ट्र संघ की सदस्यता को त्याग दिया । 1933 में जापान तथा 1937 में इटली ने भी राष्ट्रसंघ सदस्यता को छोड़ दिया यद्यपि यह दोनों ही संस्थापक सदस्य थे इसलिए उनकी सदस्यता छोड़ने का राष्ट्रसंघ पर गहरा प्रभा पड़ा राष्ट्रसंघ में अनेक कमियां थीं जिसके कारण यह सफल नहीं हुआ प्रथम उसकी संरचना दोषपूर्ण थी क्योंकि राष्ट्रसंघ के सभी महत्त्वपूर्ण विषयों पर केवल सभी सदस्यों देशो की सर्वसम्मति से ही निर्णय किए जा सकते थे जो यह प्राय संभव नहीं हो पाता था । दूसरा, राष्ट्रसंघ के पास अपना कोई सुरक्षा बल भी नहीं था । वह किसी सदस्य देश के विरुद्ध स्वयं कोई सैनिक कार्यवाही नहीं कर सकता था क्योंकि राष्ट्रीय संप्रभुता के रहते किसी भी अंतर्राष्ट्रीय सशस्त्र बल की स्थापना करना असंभव था तथा राष्ट्र संघ की तीसरी कमी यह थी कि राष्ट्रसंघ की ओर विभिन्न देशों के दृष्टिकोण में मौलिक भेद थे अधिकांश देश केवल दिखावे के लिए राष्ट्रसंघ के सिद्धांतों के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करते थे राष्ट्र संघ के आदर्शों में सदस्य देशों की कोई भी श्रद्धा नहीं थी । कोई भी देश राष्ट्रसंघ की निरस्त्रीकरण नीति का ईमानदारी से समर्थन नहीं कर रहा था  परिणाम यह हुआ कि न केवल निरस्त्रीकरण प्रयास विफल हुए , बल्कि राष्ट्रसंघ कभी भी प्रभावी संरक्षक नहीं बन सका जिसके कारण यह संगठन विफल हो गया।


वर्साय की संधि – 

प्रथम विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की विजय हुई इसके प्रश्चात मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी के शासन व्यवस्था पर अपना नियंत्रण रखना चाहते थे मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी को वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर करने के लिये मज़बूर किया गया इस संधि के तहत जर्मनी को प्रथम विश्वयुद्ध का दोषी मानकर उसपर 6 लाख पोंड का आर्थिक दंड लगाया गया , उसके प्रमुख खनिज और औपनिवेशिक क्षेत्र को मित्र राष्ट्रों ने अपने अधीन ले लिया तथा उसे सीमित सेना रखने के लिये प्रतिबद्ध किया गया इस अपमानजनक संधि ने जर्मनी में अति – राष्ट्रवाद के प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया । 


वर्ष 1929 की वैश्विक आर्थिक महामंदी :-

सन् 1929 में अमेरिका के वित्तीय संस्थानों ने अचानक यूरोपीय देशों को दिए जाने वाले ऋणों तथा पूंजी निवेश को बंद कर दिया इसके साथ ही विश्व आर्थिक संकट आरम्भ हो गया । यूरोप के अनेक देश विशेषकर जर्मनी , अमरीकी धनराशि की सहायता से तेजी से औद्योगिक प्रगति कर रहे थे लेकिन अमेरिका के इस कदम से अचानक वह प्रगति रुक गई । आर्थिक संकट का सबसे गंभीर परिणाम 1930-32 में जर्मनी में देखने को मिला जर्मनी में लगभग 7 लाख लोग बेरोजगार हो गये जर्मनी ने विवश होकर यह घोषणा किया कि वह क्षतिपूर्ति का भविष्य में कोई भी भुगतान नहीं करेगा जर्मनी के आर्थिक संकट ने प्रत्यक्ष रूप से हिटलर के तानाशाही की स्थापना में सहायता की । इस आर्थिक संकट ने अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष दोनों रूपों से प्रभावित किया । आर्थिक संकट आरम्भ होने के कारण निरस्त्रीकरण के सभी प्रयास बंद हो गई  उस समय जापान, एशिया का संसाधन संपन्न देश था  उसने आर्थिक संकट का फायदा उठाकर चीन के मंचूरिया प्रांत पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया तथा।

सन् 1932 में जापान ने अपने अधीन मंचूरिया में तथाकथित मांचुकाओ गणराज्य की स्थापना की जापान से प्रोत्साहित होकर इटली ने भी सन् 1935 में अबोसोनिया पर आक्रमण कर दिया । इस प्रकार विश्व आर्थिक संकट ने प्रत्यक्ष रूप से इटली , जर्मनी और जापान की आक्रामक गुटबंदी को प्रोत्साहित किया । यह गुटबंदी आगे चलकर द्वितीय विश्वयुद्ध का एक प्रमुख कारण सिद्ध हुआ ।

तुष्टिकरण की नीति – 

प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात कुछ समय के लिए ब्रिटेन और फ्रांस के मध्य कई मुद्दों पर मतभेद हो गये थे उस समय ब्रिटिश विदेश नीति का परंपरागत आधार शक्ति संतुलन था ब्रिटेन को यह चिंता होने लगा था कि यदि फ्रांस अत्याधिक शक्तिशाली हो गया तो पश्चिमी यूरोप का शक्ति संतुलन भंग हो सकता था । इसलिए वर्साय संधि पर हस्ताक्षर के बाद ब्रिटेन ने कुछ समय तक जर्मनी का पक्ष लेने का प्रयास किया परंतु जैसे ही हिटलर सत्ता में आया और मुसोलिनी के साथ उसका लोकतंत्र – विरोधी गठबंधन मजबूत होने लगा , ब्रिटेन और फ्रांस तेजी से एक – दूसरे के निकट आ गये । उस समय फ्रांस को जर्मनी के विरुद्ध डटकर खड़े रहने के लिए ब्रिटेन की मित्रता की बहुत आवश्यकता थी । 1933 के पश्चात फ्रांस ने अपने सभी विदेश नीति सम्बंधी निर्णय ब्रिटेन पर छोड़ दिया उस समय ब्रिटिश सरकार साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव से काफी चिंतित थे  क्योंकि उस समय ब्रिटेन के लिए न केवल सोवियत संघ की शक्ति को सीमित करना आवश्यक था , ब्लकि फ्रांस तथा स्पेन में गठित वामपंथी लोक मोर्चा को खत्म करना भी आवश्यक था जिसके लिए ब्रिटेन ने हिटलर तथा मुसोलिनी को प्रसन्न करने के लिए तुष्टीकरण की नीति अपनाई  फ्रांस ने भी शीघ्र तुष्टीकरण को नीति को अपना लिया । तुष्टीकरण का आरम्भ बाल्डविन ने किया था , परंतु चेम्बरलेन ने इस नीति को गति प्रदान किया । तुष्टीकरण के माध्यम से ब्रिटेन तथा फ्रांस ने म्यूनिख में चैकोस्लोवाकिया के विरुद्ध हिटलर का साथ दिया  ऑस्ट्रिया तथा अल्बेनिया जैसे देशों की सुरक्षा के लिए कोई भी उपाय नहीं किये गये । ब्रिटेन और फ्रांस को अपना‌ई ग‌ई तुष्टीकरण पर आधारित दुर्बल विदेश नीति ने द्वितीय विश्वयुद्ध को संभव बना दिया।


द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल देश :- 

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान विश्व दो गुटों मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्रों में बंट गया मित्र राष्ट्रो में इंग्लैंड, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ (रूस) और फ्रांस आदि देश शामिल थे तो दूसरी ओर धुरी राष्ट्रों में जर्मनी, इटली और जापान आदि देश शामिल थे‌।
इस युद्ध में 70 देशों के दल सैना वायु सेना और नौसेना ने हिस्सा लिया। 

द्वितीय विश्व यद्ध का परिणाम ( Result of World War 2 ) :-

1. नई महाशक्तियों का उदय – 

द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप क‌ई देशों और महाद्वीपों की स्थिति में बदलाव आया द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले ब्रिटेन और फ्रांस विश्व की दो प्रमुख महाशक्तियां थी लेकिन विश्व युद्ध के कारण उन्होंने अपनी माहाशक्ति की स्थिति को खो दिया द्वितीय विश्व युद्ध के परिणाम स्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ विश्व के दो प्रमुख महाशक्ति के रूप में उभरे।

2. उपनिवेशवाद का अंत –

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात ब्रिटेन और फ्रॉस विभिन्न घरेलु और बाहरी समस्याओं से जूझने लगे । ये दोनों देश अपने उपनिवेशों पर नियंत्रण रखने में सक्षम नही रहे जिसके परिणामस्वरूप आफ्रीका और एशिया से उपनिवेशवाद का अंत हो गया । 

3. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना – 

द्वितीय विश्व युद्ध के परिणाम स्वरुप सभी देशों के बीच आपस में शांति स्थापित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का उद्देश्य विश्व के विभिन्न देशों के बीच शांति स्थापित करना था।

5. शीत युद्ध की शुरुआत –

द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रश्चात के संपूर्ण विश्व में शांति  स्थापित करने के लिये जर्मनी के पॉट्सडैम में एक सम्मेलन आयोजित किया गया इस सम्मेलन में जर्मनी को चार भागों में विभाजित कर दिया गया इन चारों भागों में पहलू भाग को ब्रिटेन , दुसरे भाग को संयुक्त राज्य अमेरिका तीसरे भाग को फ्रांस और चौथे को सोवियत संघ द्वारा नियंत्रित किया जाना था । तीन पश्चिमी सहयोगियों और सोवियत संघ के मध्य कई चीज़ों पर मतभेद थे जिसका परिणाम यह हुआ कि जर्मनी दो भागों पूर्वी जर्मनी और पश्चिम जर्मनी में विभाजित हो गया पूर्वी जर्मनी में कम्युनिस्ट सरकार व पश्चिमी जर्मनी में लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना हु‌ई जर्मनी के इस विभाजन ने शीत युद्ध की नींव रखी । 

6. नई विश्व आर्थिक व्यवस्था – 

द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप कई देशों की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा खराब कई देशों को विश्वव्यापी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा इन देशों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसे ब्रेटन वुड्स सम्मेलन कहां जाता है 

ब्रेटन वुड्स सम्मेलन को आधिकारिक तौर पर संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक और वित्तीय सम्मेलन ( United Nations Monetary and Financial Conference ) के रूप में भी जाना जाता है। 1 जुलाई 1994 से 22 जुलाई 1944 तक यह सम्मेलन हुआ जिसमे 44 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए । इस सम्मेलन का उद्देश्य द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण विश्वव्यापी संकट से जूझ रहे देशों को सहायता प्रदान करना था । द्वितीय विश्वयुद्ध से प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण एवं विकास के लिये पुनर्निर्माण और विकास के लिये अंतर्राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की गई जिसका नाम पुनर्निर्माण और विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय बैंक ( IBRD ) रखा गया।

वर्तमान समय में इस बैंक को विश्व बैंक के रूप में जाना जाता है। इसके द्वारा अधिकारिक तौर पर अमेरिकी डॉलर को विश्व व्यापार के लिये आरक्षित मुद्रा के रूप में स्थापित किया गया।


इन्हें भी पढ़ें :- 

Leave a Comment